आंदोलन की आहट से घबराई NTPC,CISF के सहारे दिखाया डंडे का दम,सवालों के घेरे में मंशा

घरघोड़ा।एनटीपीसी माइनिंग लिमिटेड की तिलाईपाली कोयला खनन परियोजना में CISF यूनिट द्वारा एंटी-रायट मॉक ड्रिल का आयोजन किया गया। हालांकि इसे औपचारिक रूप से “सुरक्षा अभ्यास” बताया गया, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसे भविष्य के आंदोलनकारियों से निपटने की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।

मॉक ड्रिल के दौरान CISF जवानों ने भीड़ नियंत्रण, अनधिकृत प्रवेश रोकने और एंटी-रायट कार्रवाई का प्रदर्शन किया। सवाल यह उठ रहा है कि जब क्षेत्र में ग्रामीणों और विस्थापितों के बीच पहले से असंतोष है, तब इस तरह की ड्रिल आखिर किस संदेश को देने की कोशिश है ??

स्थानीय लोगों का कहना है कि समस्याओं का समाधान संवाद से होना चाहिए, न कि डंडों और बल प्रयोग की रणनीति से। परियोजना से जुड़े भूमि अधिग्रहण, मुआवजा और पुनर्वास जैसे मुद्दों पर अब तक संतोषजनक समाधान नहीं निकल पाया है और ऐसे में एंटी-रायट अभ्यास डर का माहौल पैदा कर सकता है।

मौके पर मौजूद परियोजना प्रमुख अखिलेश सिंह ने CISF की सराहना की, लेकिन ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का सवाल है कि क्या एनटीपीसी आंदोलन की आशंका से पहले ही सुरक्षा बलों के जरिए दबाव बनाने की तैयारी कर रही है ? मॉक ड्रिल सुरक्षा के लिए है या भविष्य में उठने वाली आवाज़ों को दबाने का पूर्वाभ्यास,ये आने वाला समय बताएगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि एनटीपीसी आखिर डंडा दिखाकर क्या बताना चाहती है? क्या कंपनी यह संदेश देना चाहती है कि अगर ग्रामीणों ने अपने हक़, जमीन, मुआवजा और पुनर्वास की बात की तो जवाब बातचीत से नहीं, बल्कि सुरक्षा बलों की कार्रवाई से मिलेगा ? स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तक जिन मुद्दों पर संवाद होना चाहिए था, उन पर चुप्पी साध ली गई और अब एंटी-रायट ड्रिल के जरिए डर का माहौल बनाया जा रहा है। सवाल साफ है-क्या NTPC तिलाईपाली का मामला बातचीत की मेज पर सुलझेगा या फिर डंडों के साये में दबाया जाएगा ? अगर एनटीपीसी सच में विकास और शांति चाहती है, तो उसे यह स्पष्ट करना होगा कि वह जनता से बात करेगी या जनता को खामोश करने की तैयारी में है।