कुरकुट नदी पर संकट: फैक्ट्रियों का कहर, प्रशासन की उदासीनता

 

 

घरघोड़ा की जीवनदायिनी नदी मरणासन्न, जनमानस भी जिम्मेदार

 

घरघोड़ा। औद्योगिक गतिविधियों और प्रशासनिक लापरवाही के कारण घरघोड़ा की जीवनदायिनी कुरकुट नदी शनै-शनै अपने अस्तित्व की अंतिम सीमा पर पहुंच रही है। नदी के किनारे स्थापित फैक्ट्रियों से निकलने वाला रसायनयुक्त कचरा सीधे नदी में बहाया जा रहा है, जिससे नदी का जल प्रदूषित हो गया है। कभी किसानों और स्थानीय समुदाय के लिए अमृत समान यह नदी अब जहर बनती जा रही है।  

स्थानीय निवासियों ने कई बार प्रशासन और पर्यावरण विभाग से शिकायत की, लेकिन किसी ने भी इस ओर ठोस कदम उठाने की जहमत नहीं उठाई। सिर्फ खानापूर्ति के नाम पर निरीक्षण और हल्के जुर्माने तक सीमित कार्रवाई ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। पर्यावरण विभाग की उदासीनता और प्रशासन की चुप्पी ने कुरकुट नदी को मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया है।  

 

फैक्ट्रियों का कचरा बना नदी का काल

कुरकुट नदी के किनारे कई फैक्ट्रियां स्थापित हैं, जिनका रासायनिक और ठोस कचरा बिना किसी शोधन प्रक्रिया के सीधे नदी में छोड़ा जा रहा है। इससे नदी का पानी जहरीला हो गया है, जिससे न केवल जलजीवों की मृत्यु हो रही है, बल्कि यह मानव और पशु जीवन के लिए भी खतरनाक साबित हो रहा है। एक समय था जब कुरकुट नदी का पानी खेती के लिए उपयोग किया जाता था, लेकिन अब किसान इसे सिंचाई के लिए भी प्रयोग करने से बच रहे हैं।

स्थानीय प्रशासन और पर्यावरण विभाग का रवैया इस समस्या को और बढ़ा रहा है। जब भी इस मुद्दे को उठाया जाता है, तब केवल कागजी कार्यवाही और जांच की बात की जाती है। धरातल पर न तो फैक्ट्रियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है और न ही प्रदूषण रोकने के लिए कोई ठोस योजना बनाई जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब शासन और प्रशासन ही मूकदर्शक बना रहेगा, तो इस नदी को कौन बचाएगा?  

आम जन भी जिम्मेदार: केवल नदी से कमाई, बचाने की नहीं कोशिश जहां प्रशासन और फैक्ट्रियां कुरकुट नदी को दूषित करने के लिए जिम्मेदार हैं, वहीं स्थानीय जनता का रवैया भी कम चिंताजनक नहीं है। कुरकुट नदी को पूजनीय मानने वाले लोग ही अब इसे बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। उल्टे, वे नदी के नाम पर पैसे कमाने और इसके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने में जुटे हुए हैं।  

नदी किनारे मछली पालन, रेत खनन और अन्य गतिविधियां अनियंत्रित तरीके से जारी हैं, जिससे नदी पर और अधिक दबाव बढ़ रहा है। स्थानीय लोग पूजा-अर्चना के नाम पर नदी में कचरा और प्लास्टिक सामग्री फेंकते हैं, जिससे प्रदूषण और बढ़ रहा है।  

 

“कृतघ्नता का उदाहरण बनते लोग”

 

कुरकुट नदी को घरघोड़ा का जीवन कहा जाता है, लेकिन आज वही लोग जो इस नदी के जल से अपनी प्यास बुझाते हैं, इसके संरक्षण के लिए आगे नहीं आ रहे हैं। यह कृतघ्नता का जीवंत उदाहरण है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब कुरकुट नदी केवल इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह जाएगी। कुरकुट नदी के अस्तित्व को बचाने के लिए सभी पक्षों—प्रशासन, फैक्ट्रियों और आम जनता—को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अन्यथा, यह नदी अपनी अंतिम सांसें गिनने को मजबूर हो जाएगी।