धान खरीदी पूरे शबाब पर है। समितियों में पैर रखने की जगह भी नहीं बची है। कलेक्टर ने तीन चरणों में भौतिक सत्यापन का आदेश दिया था। पहले चरण में ही तमनार में बोगस खरीदी घोटाला सामने आया है। समिति में करीब ढाई हजार क्विंटल धान गायब मिला, जिसकी कीमत करीब 75 लाख रुपए है। बारदानों की संख्या अधिक मिली है। इसकी रिपोर्ट बनाकर कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है। रायगढ़ जिले में धान खरीदी से केवल किसानों का भला नहीं होता, बल्कि इसकी आड़ में प्रबंधक और बिचौलिए भी लाखों रुपए अवैध कमाई कर लेते हैं। इस वजह से अंतिम दिनों में बोगस खरीदी के कारण शॉर्टेज होता है, जिसकी भरपाई बाहर से धान खरीदकर की जाती है।
इस बार कलेक्टर ने कड़ाई से भौतिक सत्यापन करने का आदेश दिया है। पहले चरण का सत्यापन बुधवार को पूरा हुआ। तमनार उपार्जन केंद्र में बोगस खरीदी का बड़ा मामला सामने आया है। प्रबंधक निलाद्री पटनायक ने कुछ बिचौलियों के साथ मिलकर किसानों के खाली रकबे में धान खरीदी दर्शाया। जबकि धान तो समिति में आया ही नहीं। बुधवार को तमनार केंद्र में राजस्व, खाद्य विभाग, मंडी व सहकारिता विभाग की संयुक्त टीम ने जांच की ।भौतिक सत्यापन में ऑनलाईन में उपलब्ध धान के विरुद्ध लगभग 6000 बोरी (2400 क्विंटल) धान कम पाया गया। ऑनलाइन में उपलब्ध बारदानों के विरुद्ध 4054 नए बारदाने अधिक तथा 5980 पुराने बारदाने कम पाए गए।
अधिक पाए बार दाने को जप्त किया गया धान की कीमत 3100 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से करीब 74.40 लाख रुपए होती है। खरीदे गए धान, मिलर्स द्वारा उठाव और संग्रहण केंद्र भेजने के बाद जितना धान होना चाहिए, उससे बहुत कम मिला। मतलब साफ है कि प्रबंधक और ऑपरेटर ने मिलर बोगस खरीदी दिखाई है। अब जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज करने की तैयारी है। गड़बड़ी सामने आने के बाद प्रबंधक निलाद्री पटनायक को निलंबित कर दिया गया है।
पूर्व अफसरों के संरक्षण में बढ़ा घोटाला
धान खरीदी केवल किसानों के कल्याण के लिए नहीं होता बल्कि बिचौलिए, कोचिए, प्रबंधक सभी मालामाल होते हैं। दागी समितियों के प्रबंधकों ने यह ट्रेंड विकसित किया है। पहले धान खरीदी के दौरान बोगस खरीदी कर लेते हैं। धान का उठाव तो मार्च-अप्रैल तक चलता है। फर्जी खरीदी के कारण धान की कमी होती है तो प्रबंधक पर कार्रवाई के बजाय भरपाई के लिए कहा जाता है। सवाल यह है कि जिस धान की खरीदी ही अवैध है, उसको वैध बनाने के लिए बाहर से रबी का धान खरीदकर मिलर्स को दिया जाता है। अब सोचिए कि किसान को धान का भुगतान 3100 रुपए की दर से होता है। जबकि रबी का धान 2200 रुपए के रेट पर मिल जाता है। मतलब 900 रुपए प्रति क्विंटल की शुद्ध कमाई।
किसके रकबे पर बिका धान, भुगतान कैसे रुकेगा?
जांच टीम के पास अब यह जानने की चुनौती है कि बोगस खरीदी किस-किस किसान के खाते में हुई है। भुगतान के तीन दिन बाद तो भुगतान प्रारंभ हो जाता है। फर्जी रकबा बढ़ाकर खरीदी की गई होगी तो भी इसकी जानकारी निकालना बेहद जरूरी है। उन किसानों को हुआ भुगतान भी रोकना होगा, तभी बोगस खरीदी से सरकार को होने वाले नुकसान से बचाया जा सकेगा। सिर्फ प्रबंधक के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई तो यह आधी कार्रवाई होगी। नोडल अधिकारी की भूमिका की जांच भी होनी चाहिए। धान की कीमत 74.40 लाख में से करीब 55 लाख का भुगतान हो चुका होगा।





