घरघोड़ा बीजेपी की लंका लगाने फिर तैयार “बीजेपी का विभीषण”

 

घरघोड़ा की राजनीतिक गलियों में एक बार फिर से चर्चाओं का बाजार गर्म है। इस बार चर्चाओं का केंद्र बने हैं बीजेपी के एक झंडा बरदार, जो पिछली नगर पंचायत अध्यक्ष चुनाव के दौरान पार्टी के “विभीषण” की भूमिका निभाने के लिए कुख्यात हुए। इनकी हरकतों ने पार्टी की नींव को न सिर्फ कमजोर किया, बल्कि शिशु सिन्हा, जो बीजेपी समर्थित नगर पंचायत अध्यक्ष थे, की कुर्सी के पलटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

पार्टी के भीतर घात और जनता के बीच निष्क्रियता

 

घरघोड़ा के ये झंडा बरदार, जो बीजेपी के टिकट पर पार्षद निर्वाचित हुए थे, ने अपने पांच साल के कार्यकाल में निष्क्रियता का ऐसा उदाहरण पेश किया, जिसकी मिसाल शायद ही कहीं और मिले। जनता ने उन्हें समस्याओं का समाधान करने के लिए चुना था, लेकिन इन्होंने जनसेवा करने की बजाय अपना अधिकतर समय पर्दे के पीछे राजनीति साधने और ठेकेदारी में व्यस्त रहने में बिताया। बीजेपी के इस नेता ने पार्षद पद का उपयोग पार्टी के सहारे अपनी ठेकेदारी चमकाने में किया। उनके इस आचरण ने जनता की नाराजगी को चरम पर पहुंचा दिया और आज ये नेता जनता की आंखों की किरकिरी बन चुके हैं।

 

पिछले चुनाव में बीजेपी को लगी थी करारी चोट

 

बीजेपी के इस विभीषण ने पिछली बार पार्टी का विश्वास तोड़ते हुए नगर पंचायत अध्यक्ष चुनाव में पार्टी विरोधी गतिविधियों में भूमिका निभाई। इनकी रणनीतियों ने शिशु सिन्हा की कुर्सी को हिलाने का काम किया और पार्टी को अंदरूनी झगड़ों में उलझा दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने घरघोड़ा में बीजेपी की साख को गहरा धक्का दिया था। भले बीजेपी के अन्य सिपाहियों ने घरघोड़ा बीजेपी को फर्श से अर्श तक पहुंचाने दिन रात एक किया तो वही दूसरी ओर ऐसे लोगो ने अंदरखाने में विभीषण की भूमिका निभा स्वयंसिद्ध राजनीति कर अपना हित साधा ।

 

आगामी चुनाव में फिर से गड़बड़ी की आशंका

 

अब, इनकी महत्वाकांक्षाएं और भी बढ़ चुकी हैं। इन झंडा बरदार ने अध्यक्ष पद के लिए बीजेपी से टिकट की मांग की है। जनता के बीच निष्क्रियता और ठेकेदारी के लिए बदनाम ये नेता अब बीजेपी के बैनर तले अध्यक्ष बनने के सपने देख रहे हैं। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि आगामी चुनाव में ये झंडा बरदार एक बार फिर से पार्टी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकते हैं। इनके पूर्व के कारनामों को देखते हुए पार्टी के भीतर ही इनके खिलाफ आक्रोश पनप रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या बीजेपी नेतृत्व इस बार इनकी चालों को नाकाम कर पाएगा, या घरघोड़ा में पार्टी की लंका लगने से कोई नहीं रोक पाएगा?

 

जनता की नाराजगी और पार्टी की चुनौती

 

घरघोड़ा की जनता ने बीजेपी के इस प्रतिनिधि से उम्मीदें लगाई थीं, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। जनसेवा से कोसों दूर इन झंडा बरदार ने जनता का भरोसा तोड़कर पार्टी के सहारे सिर्फ अपने व्यक्तिगत हित साधने का काम किया। अब जनता खुलेआम सवाल कर रही है कि ऐसे नेता, जो न सिर्फ निष्क्रिय हैं, बल्कि पार्टी की छवि को भी लगातार नुकसान पहुंचाते हैं, उन्हें अध्यक्ष पद के लिए टिकट कैसे मिल सकता है?

 

बीजेपी के सामने मुश्किल फैसले की घड़ी

 

आने वाले चुनाव में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसे विभीषणों को पहचानना और उनसे बचना होगा। अगर पार्टी ने इन्हें टिकट दिया, तो जनता के आक्रोश और पार्टी के भीतर पनपते असंतोष को संभालना मुश्किल हो सकता है।

 

घरघोड़ा में बीजेपी की साख दांव पर

 

बीजेपी के इस झंडा बरदार के पिछले पांच साल के रिकॉर्ड और विवादास्पद आचरण ने पार्टी और जनता, दोनों को निराश किया है। अब देखना यह है कि पार्टी नेतृत्व इनकी साजिशों को पहचानकर सही कदम उठाता है या जनता और पार्टी दोनों को इनकी महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा देता है।