वसीम बेग पर FIR की मांग करने वालों ने खुद ही सुनाया फैसला

वसीम बेग ने आवेदन सौंप कर की FIR की मांग

घरघोड़ा: गौरीशंकर गुप्ता द्वारा साझा किए गए विवादित वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए वसीम बेग ने “मीडिया तो सरकार का कुत्ता है” लिखा। यह एक आलोचनात्मक टिप्पणी थी, लेकिन इसे इतना बड़ा मुद्दा बना दिया गया कि कुछ तथाकथित पत्रकारों ने मिलकर वसीम बेग के खिलाफ घरघोड़ा थाने में शिकायत देकर FIR की मांग की।
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या शिकायत देने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना और उसे “देशद्रोही” व “कट्टरपंथी” कहना खुद में एक अपराध नहीं है?
क्या मीडिया ट्रायल से किसी को दोषी साबित किया जा सकता है?
शिकायत दर्ज करवाने के तुरंत बाद इन तथाकथित पत्रकारों ने सोशल मीडिया और वेब न्यूज़ प्लेटफॉर्म्स पर वसीम बेग के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। खबरों में वसीम को आरोपी बताते हुए “देशद्रोही” और “कट्टरपंथी” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, जिससे समाज में सांप्रदायिक तनाव फैल सकता है।
क्या वसीम बेग को मुसलमान होने के कारण टारगेट किया जा रहा है ?
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर यही टिप्पणी किसी अन्य धर्म के व्यक्ति ने की होती, तो क्या इतनी तीव्र प्रतिक्रिया आती?
क्या कुछ पत्रकार अपने राजनीतिक और सांप्रदायिक एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए वसीम बेग को बलि का बकरा बना रहे हैं?
अगर वसीम बेग की टिप्पणी पर FIR हो सकती है, तो टीवी डिबेट्स में रोज़ाना होने वाली बयानबाजी पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या यह मामला केवल मीडिया की छवि बचाने का है, या इसके पीछे किसी खास समुदाय के व्यक्ति को चुनकर निशाना बनाने की मानसिकता है?
अगर मीडिया को सवाल उठाने का अधिकार है, तो फिर जनता को भी मीडिया की आलोचना करने का हक़ मिलना चाहिए।
लोकतंत्र में सभी को है आलोचना का अधिकार
लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका सरकार से सवाल पूछने की होती है, न कि सत्ता के साथ मिलकर आम जनता की आवाज़ दबाने की।
1️⃣ अगर मीडिया पर कोई टिप्पणी करना अपराध है, तो फिर मीडिया को भी किसी पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं होना चाहिए।
2️⃣ अगर यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए, तो फिर कोई आम नागरिक किसी नेता, अधिकारी या संस्थान की आलोचना नहीं कर पाएगा।
3️⃣ यह सीधे तौर पर लोकतंत्र के मूल्यों का हनन है।
वसीम बेग ने भी की FIR की मांग – झूठी रिपोर्टिंग पर हो कार्रवाई!
FIR की मांग संबंधी समाचारों के सोशल मीडिया पर आने के बाद वसीम बेग ने भी घरघोड़ा थाने में शिकायत देकर इन तथाकथित पत्रकारों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की है।
वसीम बेग का ने सवाल उठाते हुए कहा कि
“अगर कोई ग्रुप चैट में लिख दे कि ‘नेता तो चोर होते हैं’, तो क्या सारे नेता मिलकर उसके खिलाफ FIR दर्ज करवाएंगे?”
“अगर कोई कहे कि ‘अधिकारी भ्रष्ट होते हैं’, तो क्या पूरा प्रशासन उस व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई करने लगेगा?”
अगर हर आलोचनात्मक टिप्पणी को व्यक्तिगत हमला मानकर प्रतिशोध की कार्रवाई होगी, तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
वसीम ने अपने शिकायत में लिखा की झूठी, भ्रामक एवं दुर्भावनापूर्ण शिकायत के विरुद्ध काउंटर-शिकायत हेतु महोदय,
सविनय निवेदन है कि मेरे विरुद्ध एक झूठी, भ्रामक एवं दुर्भावनापूर्ण शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसमें मुझ पर सोशल मीडिया के माध्यम से आपत्तिजनक एवं भड़काऊ टिप्पणी करने का निराधार एवं मिथ्या आरोप लगाया गया है।
शिकायतकर्ता द्वारा दी गई शिकायत पूर्णतः गलत, संदर्भहीन एवं दुर्भावनापूर्ण इरादों से प्रेरित प्रतीत होती है। इसका उद्देश्य मेरी छवि खराब करना, मुझे मानसिक व सामाजिक रूप से प्रताड़ित करना तथा प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर मुझे परेशान करना है।
स्पष्टीकरण एवं आपत्तियाँ:
1. मेरी पोस्ट किसी भी प्रकार से भड़काऊ नहीं थी*– प्रस्तुत व्हाट्सएप संदेश को गलत संदर्भ में प्रस्तुत कर भ्रामक रूप से व्याख्यायित किया गया है। मेरे द्वारा की गई टिप्पणी किसी व्यक्ति, समुदाय या धर्म विशेष को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं की गई थी, बल्कि यह एक सामान्य विमर्श का हिस्सा थी।
2. शिकायतकर्ता द्वारा मेरी छवि धूमिल करने का प्रयास– मेरी पोस्ट को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है ताकि मेरे खिलाफ एक पूर्वनिर्धारित धारणा बनाई जा सके। इस तरह की झूठी शिकायत से न केवल मेरी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है, बल्कि मेरे सामाजिक जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
3. शिकायतकर्ता द्वारा मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला* – भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। मेरे द्वारा दी गई राय किसी कानून का उल्लंघन नहीं करती, और इस पर कार्रवाई किया जाना मेरे मौलिक अधिकारों का हनन होगा।
4.शिकायतकर्ता स्वयं कानून का उल्लंघन कर रहा है – झूठी शिकायत दर्ज कराना स्वयं एक दंडनीय अपराध है। शिकायतकर्ता के इस कृत्य से प्रशासनिक संसाधनों का दुरुपयोग हुआ है तथा मेरे मान-सम्मान को ठेस पहुँची है। इस संबंध में भारतीय न्याय संहिता (BNS 2023) की निम्नलिखित धाराएँ लागू हो सकती हैं:
धारा 177 – झूठी सूचना देना या सत्य छिपाना।
धारा 195 – गलत इरादे से किसी निर्दोष व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाना।*
धारा 354 – मानहानि करना।
अन्य सुसंगत धाराएँ – कानून का समय बर्बाद करने एवं बेवजह शिकायत करने पर लागू हो सकती हैं।
प्रस्तुत साक्ष्य (एविडेंस):
1. व्हाट्सएप पोस्ट का मूल स्क्रीनशॉट, जिससे स्पष्ट होता है कि मेरी टिप्पणी किसी भी प्रकार से भड़काऊ या आपत्तिजनक नहीं थी।
2. शिकायतकर्ता की मंशा पर संदेह करने के पर्याप्त आधार, क्योंकि उसने मेरी पोस्ट को गलत अर्थ में लेकर उसे झूठे दावों के साथ प्रस्तुत किया।
निवेदन एवं अपेक्षाएँ:
1. मुझ पर लगाए गए झूठे आरोपों की निष्पक्ष एवं गहन जाँच की जाए और मुझे अनावश्यक रूप से प्रताड़ित किए जाने से रोका जाए।
2. झूठी शिकायत देकर प्रशासनिक संसाधनों का दुरुपयोग करने वाले शिकायतकर्ता के विरुद्ध उचित कानूनी कार्रवाई की जाए ताकि भविष्य में इस तरह के दुरुपयोग को रोका जा सके।
3. मुझे न्याय दिलाने हेतु उचित दिशा-निर्देश जारी किए जाएँ ताकि मेरी छवि को हुए नुकसान की भरपाई हो सके।
संलग्न:
1. मूल व्हाट्सएप पोस्ट का स्क्रीनशॉट।
अतः आपसे निवेदन है कि इस प्रकरण की निष्पक्ष जाँच कर उचित कानूनी कार्रवाई की जाए।
गलत दिशा में न जाए विमर्श और समाज
अब सवाल उठता है कि क्या पुलिस इन झूठी और सांप्रदायिक समाचारों पर कार्रवाई करेगी और क्या मीडिया ट्रायल और फर्जी खबरें फैलाने वालों के खिलाफ भी FIR दर्ज होगी साथ ही क्या प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब किसी निर्दोष को बदनाम करने का अधिकार है?
अगर आलोचना करना अपराध है, तो झूठी और सांप्रदायिक खबरें फैलाना उससे भी बड़ा अपराध है। अब देखने वाली बात यह होगी कि पुलिस इस मामले में क्या कार्यवाही करती है ।





