कांग्रेस-बीजेपी के सपने हुए पंचर!
जननेता बनकर उभरे सुरेंद्र सिंह चौधरी
घरघोड़ा की राजनीति में एक बार फिर जनता की आवाज़ ने बड़े-बड़ों के मंसूबों को ध्वस्त कर दिया। एक दशक पहले बैलगाड़ी छाप से निर्दलीय जीतकर इतिहास रचने वाले सुरेंद्र चौधरी (सिल्लू) ने इस बार भी कांग्रेस से टिकट न मिलने के बाद जनता के समर्थन से ऑटो छाप लेकर मैदान में उतरने का फैसला किया—और परिणाम वही हुआ! जनता ने एक बार फिर सिल्लू चौधरी के पक्ष में जनादेश देकर उन्हें नगर पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी सौंप दी।
कांग्रेस की रणनीति बनी उसकी ही दुश्मन !
कांग्रेस ने घरघोड़ा में एक बार फिर वही गलती दोहराई, जो उसने सालों पहले की थी। जननेता की नब्ज़ को परखने में चूक करने वाली कांग्रेस ने जिस प्रत्याशी पर भरोसा जताया, उसे जनता ने सिरे से नकार दिया। सवाल उठता है कि यह कांग्रेस की नासमझी थी या अंदरूनी राजनीतिक उठापटक का परिणाम? टिकट वितरण में की गई इस भूल ने कांग्रेस की नैया ऐसी डुबोई कि वह किनारे तक नहीं पहुँच पाई। अब पार्टी के लिए मंथन का समय है कि आखिर कब तक अपनी ही जड़ों को काटकर हार का स्वाद चखती रहेगी?
बीजेपी का मिशन भी हुआ फेल, 50 लाख की घोषणा भी न आई काम!
राज्य में सरकार, जिला अध्यक्ष और सांसद का घरघोड़ा का लोकल होने के बावजूद बीजेपी अपने प्रत्याशी को जीत की दहलीज तक नहीं पहुँचा पाई। सांसद महोदय ने तो वार्ड-वार जीत पर 50 लाख की बौछार करने की घोषणा तक कर दी थी, मगर जनता ने इसे सिर्फ हवा-हवाई समझा। घरघोड़ा की सड़कों पर ऑटो की गड़गड़ाहट गूँजती रही और बीजेपी का मिशन ध्वस्त हो गया। पार्टी के लिए यह हार किसी तूफानी झटके से कम नहीं, जिसने सत्ता में होते हुए भी जनता से दूरी का अहसास करा दिया।
जनता की ताकत ने सियासत को सिखाया सबक !
घरघोड़ा की जनता ने साबित कर दिया कि चुनाव टिकटों की सौदेबाज़ी से नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़े नेताओं की मेहनत से जीते जाते हैं। न पैसे की ताकत, न सत्ता की चमक—बस जनता की बुलंद आवाज़ ही असली जीत की कुंजी है। ऑटो छाप के इस ऐतिहासिक सफर ने दिखा दिया कि जब जनता ठान ले, तो सत्ता के बड़े-बड़े पहिये भी धूल चाटने को मजबूर हो जाते हैं।





